द ग्रीन माइल सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं, बल्कि इंसानियत, करुणा, अन्याय और चमत्कार की एक बेहद भावुक कहानी है। टॉम हैंक्स का अभिनय शानदार है, लेकिन जॉन कॉफ़ी के किरदार में माइकल क्लार्क डंकन इस फ़िल्म की आत्मा हैं।
फ़िल्म हमें सोचने पर मजबूर करती है कि किसी इंसान को केवल उसके रूप या परिस्थितियों से पहचानना कितना गलत हो सकता है। जॉन कॉफ़ी की मासूमियत, दयालुता और दूसरों का दर्द अपने भीतर लेने की क्षमता दिल को गहराई से छू जाती है।
अंत बेहद भावुक है और फ़िल्म खत्म होने के बाद भी इसकी कहानी लंबे समय तक मन में रहती है। मेरे लिए यह सिनेमा की उन दुर्लभ फ़िल्मों में से एक है जिन्हें जीवन में कम से कम एक बार ज़रूर देखना चाहिए।...

बिल्कुल सहमत हूँ। ❤️ द ग्रीन माइल उन दुर्लभ फ़िल्मों में से है जो सिर्फ़ देखी नहीं जातीं, बल्कि दिल से महसूस की जाती हैं। जॉन कॉफ़ी की मासूमियत और करुणा हमें इंसानियत, न्याय और दया के असली मायने याद दिलाती है। एक ऐसी कहानी जिसे भूल पाना सच में मुश्किल है। ⭐⭐⭐⭐⭐
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